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सत्रह तुम बहुत याद आओगे

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आज जा रहे हो कल बड़ी याद आओगे  जाआे खुशी- खुशी पुराने नोटो की तरह नया आ रहा है एडजस्ट करेंगे जो करना है अब वहीं करेंगे पर तुम्हारा साथ अच्छा रहा,याद आते रहोगे. - के. आर. मार्कण्डेय

जात - पात पूछै सब कोय

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जात-पात पूछै, सब कोय . हरि को भजे, न हरि का होय.. ये जग जिनके बाप का उनको लख प्रणाम . अपना था वो रहा नहीं, हारे को हरि नाम .. - के. आर. मार्कण्डेय

सद् गुरू कबीर दास

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जग के हरे हवे पीर भइय्या रे सदगुरू दास कबीर गढ़ि- गढ़ि खोट काढ़ै मन के शबद चलाके तीर हिन्दवा ल हिन्दवाई सिखाये तुरकन ल तुरकाई सतनामी ल सतनाम लखाये सेवक ल सेवकाई बइठे गंगा तीर मनखे ल तैं मनखे माने कभू दुसर नइ जाने शून्य गगन में पुरूष के वासा एक तिही पहिचाने हंस उबारे तीर दुनिया बोले कागद लेखी तोर शबद हे आँखन देखी सुन के सबके तन-मन भिंगगे क्षिण म उतरगे, मन के शेखी लगगे तोर अबीर काशी म तोर जनमन होइस तोर ज्ञान दुनिया ल धोइस मगहर म तैं ठाठ ल छोड़े सबे वचन तोर पूरा होइस लोग बहावे नीर - के. आर. मार्कण्डेय

कहाँ आथस जाथस, बता के जाना

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कहाँ आथस - जाथस , बता के जाना अरे मोर हीरा, चेता के जाना तोर संसो म बसे हे पराना तिही हमर सपना, तिही हमर अाँखी अस तिही हमर संगी, तिही हमर साथी अस तिही हमर गरब गुमाना बदले हे बेरा , बाबू , बइरी जमाना हे खाड़ा वाले खाड़ा धरे, गाज गिराना हे सरू- सरू बनथे निशाना कोरा म खेलाये हन दुनिया देखाबो ग जिहाँ- जिहाँ जाहूँ कहिबे, ऊंहे ले के जाबो ग तोर पल- पल रखबो धियाना _ के. आर. मार्कण्डेय

मेडम जी

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मेडम जी ! तुम लाख करो चतुराई हम हार नइ मानन तोर फुले- फरे अमराई हम रार नइ ठानन तोला जतका हे अधिकार नचा ले हमला जेला तैं बचावत हस बचा ले उनला अतके हे बस हम नाचे के पार नइ जानन फुटबाल कस खेलत हस तब बने खेल हमर का हे जिनगी लागे जइसे संउहत जेल बरतन ल हम मांजत हन तलवार नइ मांजन ! -

समाज ल जगाये हे, नकुल ढीढी

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ये समाज ल जगाये हे नकुल ढीढी गुरू ज्ञान. लखाये हे नकुल ढीढी बिना ज्ञान कतको रहे तञ पथरा जेमा पानी पोहाये हे नकुल ढीढी बाबा साहेब के ज्ञान ल जानिस घासीदास के धरम ल मानिस प्रथम जयंती मनाये हे नकुल ढीढी महासमुन्द जिला में भोरिंग एक ग्राम हे उंहे ऊंकर जनमन, हमर नेक धाम हे संत सेवा म बिते हे ऊंकर पीढ़ी ननपन ल जाने हे दुनिया के दुःख ल छुआछूत, भेदभाव, गरीबी अऊ भूख ल जेकर छाती म लगाये हे एक सीढ़ी - के. आर. मार्कण्डेय

सतनामी तुम जागव, दुनिया जाग गे हे

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सतनामी तुम जागव दुनिया जाग गे हे दगर- दगर अंगार बरत हे सब अँधयारी भाग गे हे तन के चिरहा- फरिया,चेंदरा फेके बर हे घुरवा में नवा छांट के बरतन ले ले पानी झन पी चुरवा में पानी के महिमा तुम जानो पानी जाग गे हे जांगर म जतका बल हे सुध अनुमान करव तुम आज समय़ के संग चले बर खुद ऐलान करव तुम माटी के महिमा तुम जानो माटी जाग गे हे हाथ के रेखा, करम के लेखा बदले बर हे तुंहला अपन- अपन मन भीतरी के मेटे बर हे धुंधला शनि गिरहा के पोथी पतरा दुरिहा भाग गे हे चार कदम तुम मिल के  रेंगव झकनाही दुनिया के लोग सुमत के तुम गोठ चलावव छंटयाही अँधयारी रोग सुनता के सुर सब जागे बिनता भाग गे हे आशा के तुम दिया बारो मन उजियार करो बेरा के पाँखी ल चीन्हौ झन ढेर ढार करो बेरा के महिमा तुम जानो बेरा जाग गे हे बड़ महिनत से फल मिलही बाना बांध झन डरना कोनो चाहे लाख लड़ावे आपस में नहीं लड़ना महिनत के फल होथे मीठा झगरा भाग गे हे बड़े- बड़े तुम पद म बइठो गरब कभू झन करना दुखिया के दुःख दूर करे बर सीना तान के लड़ना तुंहर लड़े ले अइसे लागे वीरता जाग गे हे का करना हे आगे दिन म ...