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हाँसी नंदागे काबर मोर गाँव म

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पीपर , आमा ,  कदम रुख छाँव म बइरी हाँसी नंदागे काबर मोर गाँव म शहर म समा गे सबे खेतिखार कमइय्या के जांगर होगे बीमार नाचा- बाजा ल होगे तीजरा बुखार नाव भर के रहिगे सरी तिहार बेड़ि लगे हे जस पांव म चरचिर ले लइका मन खेलत हे दुवारी में दाई भुलाये हे दुनिया के चारी में संगी- जहुँरिया मन माते हे मस्ती में रद्दा लजाये हे बिकलांग गारी में वो पासा हलावत बइठे हे दाँव म कतको झन के हाड़ी रीता परे हे केउ- केउ दिन में ग चुल्हा बरे हे रहन म बुड़गे सबो टठिया- बरतन ठुठवा बरोबर तन ल करे हे पथराये आँखी हे अंतस के घाव म रचना दिनांक 04 .09.1999 सा. के. आर. मार्कण्डेय

छत्तीसगढ़ के भुइंया बघवा के माढ़ा

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तेंदुसार के लउठी , अखरा म खाड़ा हे ये छत्तीसगढ़ के भुइंया , बघवा के माढ़ा हे तपसी , दानी , उद्भट ज्ञानी मन के भुइंया ये वीरनारायण सिंह के बलिदानी भुइंया ये पसिया पीने वाला तन में वजनी हाड़ा हे इहां के माटी धरम धाम कस अतिशय पावन हे देव बरोबर दाई- ददा के धुर्रा चंदन हे सबे धरम के , सबे जात के इहां जमाड़ा हे जेकर बल जादा होथे वो सदाचार म रहिथे ऊंच- नीच , मंगल- सोहर बोली- बात ल सहिथे छत्तीसगढ़िया तन के बस इहि पहाड़ा हे तन में इहां लंगोटी पहिरे मन म नाम धरे हे छाता पहाड़ी के साधु साँचा सतनाम करे हे धजा- पताका सेत रंग के ठंव- ठंव गाढ़ा हे गोड़वानी, पंडवानी , करमा सुवा ददरिया हे लोरिक बरिघना , आल्हा के सब राग गवइय्या हे फगुनाही रंग झाझर में नित गमके नगाड़ा हे गुरतुर बोली , सिधवा बानी फेर तन म लहु हवे गा जे दिन माटी मांग लिही वो दिन धार बही गा सबर के बांधा उथली नइये अड़बड़ दाहरा हे रचना दिनांक 22.01.2000 सा. के. आर. मार्कण्डेय

छत्तीसगढ़ के माटी अब जागे हे

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छत्तीसगढ़ के माटी अब जागे हे जागो ग किसान जुग जागे हे जागे के बेरा अब आ गे हे जागो ग किसान , जुग जागे हे ददा- परिया के तोर भुइंया ग पानी के मोल झन बेचौ नइ मिले कोनो मेर छइंहा ग माटी के मोल मन सोचौ कतको लेवइय्या नित मांगे हे तुम हो पोसइय्या सरी दुनिया के तुंहरे अनाज सब खावत हे आज हवे कोठी काबर तुंहर सुन्ना चतुरामन मेछरावत हे तोर हाँसी- खुशी ह लुकागे हे दिनो- दिन बाढ़त हे मंहगाई ह सबे जिनिस होगे महंगा बाबू बर नइये बने कुरता नोनी बर नइये तोर लहंगा छानी के खदर उड़ागे हे माटी म हवे तुंहर हीरा के ढेरी खन कोड़के आज निकालो घुर घुरहा जिनगी के पीरा पराही महिनत संग चेत जगालो संगवारी मन घलो आ गे हे जगा- जगा जुरमिल विचारत हे नवा समाज के गढ़ैया मन सबो बर बने दिन लानत हे गरीब के आरो लेवइय्या मन गरीबी आज हरुवा गे हे रचना दिनांक 11.06.1999 सा. के. आर. मार्कण्डेय  

संत प्रवर रैदास

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हे संत प्रवर रैदास दीन- दुःखी अउ टूटे मनके एक प्रबल विश्वास काशी म तोर जनमन होइस रघु राजा के वंशज जाति- धरम म तोला जानिन चार बरन ल अंतज सबके गरब करे हो नाश तोर भगति म साहेब रीझे मन ल बनायेव चंगा तोर कठौती ले परगट होइस बेटी बनके गंगा तोर महिमा हे कैलाश कठिन परीक्षा ले ये हे तोर मनखे मन दुरजन ह पानी में साहेब तंउरे हे देखे हे जन- जन ह जग म करेव परकाश पारस ल तुम पथरा जानेव खोंच देयेव छप्पर म ज्ञान के दौलत जग ल बाटेव सब आइन तोर शरण म बन गेव सबके आस रानी झाला , मीरा  बाई तोर शरण म आये हे चित्तौड़ नगर के शोभा बढ़गे तोला गुरू बनाये हे तोर छतरी बने हवे इतिहास - सा. के. आर. मार्कण्डेय

ग्रेट रिपब्लिकन नकुल देव ढीढी

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गणतंत्र दिवस  26 जनवरी 2018 के पावन अवसर पर ग्राम भटगाँव तहसील व जिला दु्र्ग छ.ग. में प्रदेश के महान रिपब्लिकन , गुरू  घासी दास जयंती के जन्मदाता . स्व. नकुल देव ढीढी जी की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई . प्रतिमा का अनावरण श्री अजीत प्रमोद कुमार जोगी प्रथम मुख्य मंत्री छत्तीसगढ़ ने किया.

तोला कोन बन खोजंव चिरैंया

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तोला कोन बन खोजंव चिरैंया तैं उड़ गये देश- बिदेश तोर शोर मिले न संदेश तैं उड़ गये देश- बिदेश रतिहा पहाथे , सुरूज चले आथे लाली- गुलाली रंग साथ म आरो लेवत मैं बन- बन भटकथंव राजा सगर के बाग म मोला सुरता म डारे लेश घाट- घठौंदा , ये तरिया , ये नदिया पुतकी परे हे मोर पांव म घर - घर कहानी , हो गेंव दीवानी चरचा हवे सरी गाँव म लगथे करेजवा म ठेस प्रेम दीवानी , मैं अनजानी तोर मया म बंधागेंव प्रेम हवे रे , नेम हवे रे का छांदे तैं , बइरी छंदागेव मोला काबर दिये तैं कलेष -  सा. के. आर. मार्कण्डेय

होबे निरमोही तैं झन आबे रे

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ये शहर वाले हवा, ठहर रहिबे मोला जाना हवे गाँव बर- पीपर जुड़ छांव जिहां लिखे हवे नाम खबर कहिबे संझा के बेरा जोहत रइहूं तैं आबे नइ आबे देखत रइहूं नइ आबे ते गड़ौना फोन करिबे आही तोर सुरता रोवत रइहूं अाँसू म काजर धोवत रइहूं मोर सोर संदेशा पूछत रहिबे होबे निरमोही तैं झन आबे रे गाँव पुरवाही तैं कहाँ पाबे रे शहर म सर- सर छिकत रहिबे -